MARGADARSHANAM – A Socio Educational Organization
‘मार्गदर्शनम्’ एक पंजीकृत सामाजिक एवं शैक्षिक संस्था है, जो शिक्षा, भारतीय ज्ञान-परम्परा, संस्कृति, अध्यात्म, संस्कार, शोध, साहित्य एवं सामाजिक सेवा के माध्यम से समाज के समग्र विकास के लिए समर्पित है। संस्था का विश्वास यह है कि शिक्षा केवल सूचना या परीक्षा-उत्तीर्णता का माध्यम नहीं है यह तो व्यक्ति के भीतर विवेक, चरित्र, संवेदनशीलता, आत्मविश्वास, उत्तरदायित्व की भावना का विकास करने वाली जीवन-निर्माण प्रक्रिया है। जैसा कि उपनिषद् कहते हैं “सा विद्या या विमुक्तये” अर्थात् वही विद्या सार्थक है जो मनुष्य को अज्ञान, संकीर्णता और बंधनों से मुक्त कर उसे विवेक और प्रकाश की ओर ले जाए। इसी भावना के अनुरूप ‘मार्गदर्शनम्’ की मान्यता है कि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य डिग्री या रोजगार से ऊपर मानव-निर्माण और चरित्र-निर्माण है।
‘मार्गदर्शनम्’ इस विचार को व्यक्त करता है कि जीवन को सही दिशा देने वाला ज्ञान, उस ज्ञान को आचरण में उतारने वाले संस्कार और उन संस्कारों को समाजहित में रूपांतरित करने वाली सेवा ही किसी भी व्यक्ति और समाज के वास्तविक उत्थान का आधार है।
“ज्ञानं भारः क्रियां विना संस्कारः शोभते सदा।” अर्थात् केवल ज्ञान नहीं, बल्कि संस्कार और क्रिया ही जीवन को सार्थक बनाते हैं। इसी दृष्टि से संस्था आधुनिक शिक्षा की उपलब्धियों को भारतीय ज्ञान-परम्परा की जीवन-दृष्टि, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना के साथ समन्वित करते हुए कार्य करती है, ताकि व्यक्ति केवल रोजगार-योग्य ही नहीं, बल्कि जीवन-योग्य, समाजोपयोगी और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी नागरिक बन सके।
‘मार्गदर्शनम्’ ऐसी शिक्षा एवं सामाजिक व्यवस्था की परिकल्पना करता है जिसमें ज्ञान और संस्कार, आधुनिकता और परम्परा, विज्ञान और मानवीय मूल्य तथा व्यक्तिगत विकास और सामाजिक उत्तरदायित्व एक-दूसरे के पूरक बनकर कार्य करें। संस्था का उद्देश्य ऐसी पीढ़ी का निर्माण करना है जो—
ज्ञानवान और विवेकशील हो, संस्कारित और चरित्रवान हो, आधुनिक कौशलों से सम्पन्न हो, अपनी भारतीय जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हो, वैज्ञानिक एवं तार्किक दृष्टि रखती हो, प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील हो, सामाजिक समरसता और मानवता को जीवन का आधार मानती हो, तथा आत्मनिर्भर एवं उत्तरदायी नागरिक बने।संस्था का ध्येय शिक्षा, शोध, संस्कार और सेवा को एक समन्वित सामाजिक प्रक्रिया के रूप में विकसित करना है। “विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।” अर्थात् शिक्षा विनम्रता देती है और विनम्रता व्यक्ति को योग्य बनाती है। “तमसो मा ज्योतिर्गमय” अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाना ही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है। इसी आधार पर संस्था—
ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने, भारतीय ज्ञान-परम्परा को समकालीन संदर्भों में पुनः प्रस्तुत करने, शिक्षा को संस्कार से जोड़ने, शोध को समाजोपयोगी बनाने, युवाओं में जिज्ञासा और रचनात्मकता विकसित करने, बालकों में जीवन-दृष्टि का निर्माण करने,भारतीय भाषाओं और संस्कृति का संरक्षण करने तथा सेवा के माध्यम से वंचित वर्गों तक सहयोग पहुँचाने का सतत प्रयास करती है।
‘मार्गदर्शनम्’ का प्रमुख कार्यक्षेत्र भारतीय ज्ञान-परम्परा और आधुनिक शिक्षा के बीच सार्थक संवाद स्थापित करना है। “यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्” अर्थात् जहाँ सम्पूर्ण विश्व एक परिवार के रूप में देखा जाए। वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता, पुराण, दर्शन, योग, आयुर्वेद, भारतीय गणित, खगोल, कला, साहित्य और लोकज्ञान जैसी परम्पराओं में निहित जीवनोपयोगी ज्ञान का अध्ययन करते हुए संस्था उन्हें आधुनिक विज्ञान, तकनीक और समकालीन सामाजिक आवश्यकताओं से जोड़ने का प्रयास करती है। इसका उद्देश्य अतीत की पुनरावृत्ति नहीं, अपितु परम्परा के जीवनोपयोगी तत्त्वों का पुनर्पाठ और उन्हें वर्तमान संदर्भों में पुनर्स्थापित करना है।
“बाल्ये विद्या परं बलम्” अर्थात् बाल्यावस्था में प्राप्त शिक्षा ही सबसे बड़ी शक्ति है। इसी आधार पर प्रारम्भिक बाल्यावस्था से लेकर उच्च शिक्षा तक विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास, भावनात्मक संतुलन, सामाजिक समझ, नैतिक मूल्य, रचनात्मक क्षमता पर विशेष बल दिया जाता है। इसके अंतर्गत प्रारम्भिक बाल शिक्षा, भाषा एवं साक्षरता विकास, संस्कारपरक शिक्षा, भारतीय ज्ञान-परम्परा आधारित शिक्षण, जीवन-कौशल, डिजिटल शिक्षा, कैरियर मार्गदर्शन, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, व्यक्तित्व-विकास जैसे कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं।
संस्था शिक्षा, संस्कृति, भाषा, साहित्य, समाज और भारतीय ज्ञान-परम्परा से जुड़े विषयों पर अनुसन्धान को प्रोत्साहित के साथ-साथ साहित्य और ज्ञान-विमर्श को समाज से जोड़ने के लिए प्रकाशन गतिविधियों का संचालन करता है। मार्गदर्शनम् पत्रिका के माध्यम से शिक्षा, संस्कृति, साहित्य, नैतिक मूल्य, समसामयिक विषय पर विचारपरक सामग्री प्रकाशित की जाती है। “भाषा राष्ट्रस्य आत्मा भवति” भारतीय भाषाएँ संप्रेषण का माध्यम मात्र नहीं है, अपितु हमारी संस्कृति और चेतना की वाहिका हैं। अतः संस्था हिन्दी, संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं के अध्ययन, लेखन, शिक्षण, प्रकाशन को प्रोत्साहित करती है। भारतीय आध्यात्मिक परम्परा जीवन को जीवन-मूल्यों से जोड़ती है। गीता, उपनिषद्, रामायण, पुराण, योग और संत-साहित्य के माध्यम से आत्मचिन्तन, संयम, करुणा, सत्यनिष्ठा, कर्तव्यबोध का विकास करने में सहायक हैं ।
भारत की सांस्कृतिक विरासत लोकपरम्पराएँ, तीर्थ, कला, संगीत, स्थापत्य हमारी पहचान हैं। संस्था इनके संरक्षण हेतु सांस्कृतिक कार्यक्रम, विरासत यात्राएँ, अध्ययन भ्रमण, प्रदर्शनियाँ आयोजित करती है।
“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” युवाओं को कैरियर काउन्सिलिंग, व्यक्तित्व विकास, नेतृत्व प्रशिक्षण, प्रतियोगी परीक्षा आदि क्षेत्र में उचित मार्गदर्शन एवं परामर्श संस्था के मार्गदर्शकों द्वारा दिया जाता है।
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” के सिद्धान्त पर महिला एवं बाल विकास के लिए शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य जागरूकता, आत्मनिर्भरता आदि क्षेत्रों में संस्था द्वारा सतत कार्य किया जा रहा है।
“कर्मण्येवाधिकारस्ते” की अनुपालना करते हुए संस्था द्वारा शिक्षा के साथ कौशल विकास पर बल दिया जाता है डिजिटल साक्षरता, संचार कौशल, शिक्षण कौशल, व्यावसायिक प्रशिक्षण इत्यादि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। वृक्षारोपण, जल-संरक्षण और स्वच्छता अभियान के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के साथ अन्य सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।
“एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र का विकास ही हमारा जीवन दर्शन है।
“असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योमा अमृतं गमय” के साथ-साथ ‘अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते’ यही हमारा संकल्प तथा जीवन लक्ष्य है।
"Knowledge, Values, and Service — The True Path to Social Transformation."
"हमारा विश्वास है कि ज्ञान, सेवा और संस्कार का समन्वय ही एक सशक्त, संवेदनशील एवं समृद्ध समाज का आधार है। मार्गदर्शनम् ऐसी शिक्षित, संस्कारित और आत्मनिर्भर पीढ़ी गढ़ने हेतु कटिबद्ध है जो मानवीय व राष्ट्रीय मूल्यों को समर्पित हो।"